पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण भत्ता आवेदन की तिथि से मिले: हाईकोर्ट

प्रयागराज, 29 दिसम्बर । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण भत्ता आवेदन की तिथि से ही दिया जाना चाहिए, न कि अदालत के आदेश की तारीख से। कोर्ट ने कहा कि यदि भरण-पोषण आदेश की तारीख से दिया जाएगा, तो इससे महिला को अनावश्यक आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है।

यह आदेश न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ल की एकल पीठ ने कौशाम्बी जिले की सोनम यादव की याचिका पर सुनाया। हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय के आदेश में संशोधन करते हुए कहा कि भरण-पोषण का अधिकार आवेदन दायर करने के साथ ही शुरू हो जाता है।

मामले के अनुसार, सोनम यादव ने अपने पति के खिलाफ अक्टूबर 2023 में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का आवेदन दाखिल किया था। इसके बाद उन्होंने अगस्त 2024 में अंतरिम भरण-पोषण के लिए अलग से आवेदन किया। कौशाम्बी की परिवार अदालत ने अप्रैल 2025 में आदेश देते हुए कहा था कि अंतरिम भरण-पोषण आदेश की तारीख से ही देय होगा, आवेदन की तारीख से नहीं।

इस आदेश को सोनम यादव ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। याची के अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के “रजनीश बनाम नेहा” (2020/2021) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा है कि आमतौर पर भरण-पोषण आवेदन की तिथि से दिया जाना चाहिए और यह सिद्धांत अंतरिम भरण-पोषण पर भी लागू होता है।

वहीं, प्रतिवादी पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश केवल अंतिम भरण-पोषण आदेशों पर लागू होते हैं, न कि अंतरिम भरण-पोषण पर। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण का उद्देश्य महिलाओं और बच्चों को तत्काल आर्थिक सुरक्षा देना है, खासकर तब जब वे पति या पिता द्वारा छोड़ दिए गए हों या उनके पास आजीविका के पर्याप्त साधन न हों। अंतिम आदेश आने में समय लग सकता है, लेकिन इस अवधि में भी महिला को भरण-पोषण का अधिकार है, और यह अधिकार आवेदन की तारीख से ही प्रभावी माना जाएगा।