यह एक बहुत ही प्रेरणादायक और सकारात्मक घटना है, जिसमें वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता और मानवता की मिसाल देखने को मिली। ओछड़ी के पास घायल अवस्था में पाए गए बार्न आउल (घास फूस का उल्लू) की रेस्क्यू और उपचार की पूरी प्रक्रिया ने यह साबित किया कि जब लोग मिलकर काम करते हैं, तो किसी भी संकट में पड़े जीव की मदद की जा सकती है।
इस घटना में मनीष तिवारी और रेस्क्यू टीम के मुबारिक का योगदान सराहनीय है, जिन्होंने घायल उल्लू को तुरंत चिकित्सा सहायता दिलवाने के लिए उसे वन्यजीव चिकित्सक डॉ. धर्मेन्द्र के पास भेजा। उल्लू का पंख गंभीर रूप से घायल था, लेकिन सर्जरी और उपचार के बाद इसे राहत मिली, हालांकि वह अभी उड़ने में सक्षम नहीं है। इसे अब वन विभाग को सौंप दिया गया है और उसकी सेहत पर निगरानी रखी जा रही है।
बार्न आउल, जिसे घास फूस का उल्लू भी कहा जाता है, की पहचान उसकी सफेद-भूरे रंग की चेहरे की बनावट और लंबे पंखों से होती है। यह पक्षी रात्रिचर होता है और कीटभक्षी होने के कारण कृषि के लिए फायदेमंद होता है, क्योंकि यह कीटों को नियंत्रित करता है। भारत में यह उल्लू राजस्थान सहित कई क्षेत्रों में पाया जाता है और अपनी चुपचाप उड़ने की क्षमता के कारण शिकार करते समय अदृश्य रहता है।
इस तरह की घटनाएं हमें यह याद दिलाती हैं कि हमें न केवल अपने आस-पास के पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए, बल्कि वन्यजीवों के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए। यह इंसान और प्रकृति के बीच एक सशक्त संबंध का उदाहरण है।