अफीम की खेती में दबंगों का दबदबा, बिना लाइसेंस मिलीभगत से हो जाती है बुआई

चित्तौड़गढ़, 07 अप्रैल । मेवाड़ और मालवा क्षेत्र में काला सोना कहे जाने वाली अफीम को लेकर हमेशा से सियासत सक्रिय रही है वहीं अफीम की खेती में विवादों का नाता रहा है। सूत्रों के हवाले से जानकारी है कि नारकोटिक्स विभाग द्वारा जारी किए जाने वाले पट्टों में भी प्रभावशाली लोगों का दबदबा है और भूमिहीन व भोले किसानों के पट्टों पर कई शक्तिशाली लोग अफीम की खेती कर अपना उल्लू सीधा करने में लगे है। जानकारी है कि इस प्रकार की खेेती में यह दबंग और दबदबे वाले लाेग किसानों से छह महीने का एग्रीमेंट करते है और पट्टा धारक से लिखवाकर खुद खेती में लग जाते है। ऐसे कई मामले सामने आए है जहां पट्टाधारक किसान नहीं होने के बावजूद उसके घर से कई किलो अफीम मिली है। पिछले दिनों देवरिया गांव का मामला भी सुर्खियों में रहा है लेकिन जानकारी है कि जिस उदयलाल नाम के व्यक्ति के घर से 32 किलो अफीम बरामद की गई उसके स्वयं भी पट्टा नहीं है। यह ऐसे मामले है जहां पट्टाधारक किसान से अनुबंध कर मुखिया की सहमति से प्रभावशाली लोग अफीम उगाते रहे है और किसान के हाथ कुछ भी नहीं लग पाता है।

उल्‍लेखनीय है कि नारकोटिक्स विभाग अफीम का पट्टा जारी करने की पूरी प्रक्रिया करता है और उन किसानों को भी अफीम का पट्टा दिया जाता है। जिनके भूमि नहीं है ताकि वे किसान दूसरे की भूमि किराये पर लेकर खेती कर सके। ऐसे दर्जनों किसान है जिनके पट्टों पर कई प्रभावशाली और दबंग खेती कर रहे है और कई लोग तो ऐसे है जो 4-4 पट्टों की खेती एक साथ कर रहे है। इसी तरह के एक मामले में पांडोली स्टेशन पर हुए मामले में नीमच नारकोटिक्स विभाग ने एक ही घर में चार-पांच पट्टों की 52 किलो अफीम जब्त की थी। ऐसे में सवाल उठता है कि अफीम के पट्टों में खरीफ किसानों को अफीम की खेती का कितना लाभ मिल पा रहा है।

इस संबंध में जिला अफीम अधिकारी, खंड प्रथम, चित्तौड़गढ़ बीएन मीणा का कहना है कि जिस व्यक्ति के नाम पर विभाग पट्टा जारी करता है, नियमानुसार वही बुआई करता है। कई बार किसान दूसरे खेत में भी अनुबंध के आधार पर बुआई कर सकता है लेकिन यदि कोई व्यक्ति 3-4 किसानों के पट्टों पर एक साथ खेती करता है तो नियम का उल्लंघन है। उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।