27 साल बाद खत्म हुआ हिंदुस्तान जिंक का टैक्स विवाद

जोधपुर, 20 अप्रैल । राजस्थान उच्‍च न्‍यायालय ने उदयपुर स्थित हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड और आयकर विभाग के बीच 27 साल पुराने टैक्स विवाद को अंतिम रूप से सुलझा दिया है। जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने आयकर विभाग की दो अलग-अलग अपीलों पर सुनवाई करते हुए कर विवाद समाधान योजना-1998 (केवीएसएस) के तहत हुए समझौतों की कानूनी स्थिति स्पष्ट की।

कोर्ट ने कर निर्धारण वर्ष 1993-94 के मामले में विभाग की अपील खारिज कर कंपनी को राहत दी है। वहीं, कर निर्धारण वर्ष 1995-96 के मामले में रिफंड के दावे को कानूनी रूप से खारिज मानते हुए विभाग के पक्ष में फैसला सुनाया है। यह पूरा मामला वर्ष 1998-99 में शुरू हुई कर विवाद समाधान योजना (केवीएसएस) से जुड़ा है। हिंदुस्तान जिंक ने बकाया करों के निपटान के लिए घोषणा की थी, जिसके बाद आयकर आयुक्त ने फरवरी 1999 में प्रमाण पत्र जारी कर समझौते पर मुहर लगा दी थी।

विवाद तब खड़ा हुआ जब आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (आईटीएटी) ने 23 जनवरी 2008 को कंपनी के पुराने वर्षों के घाटे को समायोजित करके टैक्स रिफंड जारी करने का आदेश दिया। विभाग ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि केवीएसएस के तहत एक बार समझौता हो जाने के बाद कोई रिफंड कानूनी रूप से देय नहीं है। विभाग की ओर से अधिवक्ता केके बिस्सा ने तर्क दिया कि वित्त अधिनियम 1998 की धारा 93 के तहत योजना में जमा राशि का रिफंड मना है। वहीं, कंपनी के वकीलों अंजय कोठारी और हरप्रीत सिंह ने दलील दी कि पिछले वर्षों का घाटा और उससे जुड़ा रिफंड केवीएसएस समझौते के दायरे से बाहर का विषय था।

खंडपीठ ने दोनों अपीलों का डिटेल विश्लेषण कर अलग-अलग व्यवस्थाएं दी हैं। कर निर्धारण साल 1993-94 के संबंध में कोर्ट ने पाया कि उस वर्ष का केवीएसएस प्रमाण पत्र केवल बकाया ब्याज के लिए था, जिसमें टैक्स की कोई मांग शामिल नहीं थी। अदालत ने माना कि साल 1992-93 के 5.53 करोड़ रुपये के घाटे को इस साल की आय में समायोजित किया जाना उचित था। इसके परिणामस्वरूप, कोर्ट ने आईटीएटी के उस निर्देश को सही ठहराया जिसमें इस घाटे पर आधारित टैक्स कंपनी को वापस करने का आदेश दिया गया था। वहीं, कर निर्धारण साल 1995-96 के मामले में कोर्ट ने विभाग की अपील स्वीकार कर ली।

इस मामले में कुल 50.30 करोड़ रुपये से ज्यादा की बकाया मांग के विरुद्ध कंपनी ने मात्र 16.84 करोड़ रुपये देकर सेटलमेंट किया था, जिसमें 22.13 करोड़ रुपये की आयकर मांग भी शामिल थी। जस्टिस अरुण मोंगा ने स्पष्ट किया कि साल 1994-95 के 4 करोड़ 3 लाख 12 हजार 165 रुपए के घाटे पर टैक्स रिफंड देना समझौते की निर्णायकता को प्रभावित करेगा। कोर्ट ने माना कि वित्त अधिनियम 1998 की धारा 90(3) के अनुसार, योजना के तहत जारी प्रमाण पत्र अंतिम है और उसे दोबारा नहीं खोला जा सकता। रिफंड देने से कंपनी को अनुचित लाभ मिलेगा, जो कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है।