जयपुर, 03 नवंबर । राजस्थान हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों से जुडी रिट याचिकाओं को अलग से पंजीकृत करने की व्यवस्था को बहाल कर दिया है। इसके साथ ही हाईकोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि वह राजस्थान हाईकोर्ट नियमावली के नियम 315 तथा अन्य लागू नियमों एवं न्यायालय की लंबे समय से चल रही प्रक्रिया के अनुसार आपराधिक मामलों से उत्पन्न रिट याचिकाओं को आपराधिक रिट याचिका के नाम से स्वीकार कर पंजीकृत करें और उन पर कार्रवाई की जाए। इसके अलावा जो आपराधिक रिट याचिकाएं वर्तमान में लंबित हैं, लेकिन किसी दूसरे नाम से दर्ज की गई हैं, उन्हें दो सप्ताह के भीतर दोबारा आपराधिक रिट याचिका के तौर पर पंजीकृत किया जाए और बाद में उन्हें संबंधित रोस्टर के अनुसार उचित बेंच के समक्ष पेश करें। सीजे संजय के. अग्रवाल, जस्टिस समीर जैन और जस्टिस अनुरूप सिंघी की फुल बेंच ने यह आदेश रवि कुमार की याचिका पर भेजे रेफरेंस पर सुनवाई करते हुए दिए।
इस फैसले से पूर्ण पीठ ने पूर्व एसीजे की खंडपीठ का 7 जुलाई 2026 का वह आदेश भी पलट दिया, जिसमें आपराधिक याचिकाओं को अलग से पंजीकृत नहीं करने और इस व्यवस्था को बंद करने के लिए कहा था। अब सीजे की पूर्ण पीठ ने आपराधिक याचिका के अलग से पंजीकरण की व्यवस्था को बहाल करते हुए कहा कि पूर्व फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट रूल्स के वैधानिक प्रावधान पर ध्यान नहीं दिया था। जबकि इस नियम में आपराधिक मामलों से संबंधित अनुच्छेद 226 की रिट याचिकाओं को क्रिमिनल मिसलेनियस केस के रूप में दर्ज करने का स्पष्ट प्रावधान मौजूद है। इसलिए केवल यह कहकर कि संविधान में आपराधिक रिट याचिका नाम की कोई श्रेणी नहीं है, इस वैधानिक प्रावधान को निष्प्रभावी नहीं कर सकते।