पंजाब:बेअदबी मामलों की डिजिटल एंगल से भी होगी जांच,नई एसओपी जारी

चंडीगढ़, 20 अप्रैल । पंजाब में बेअदबी केसाें की जांच को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने के लिए पंजाब पुलिस ने नई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की है। यह एसओपी पंजाब ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन द्वारा तैयार की गई है, जिसमें फॉरेंसिक सटीकता, डिजिटल साक्ष्यों की सुरक्षा और समयबद्ध कानूनी कार्रवाई पर विशेष जोर दिया गया है।

नई एसओपी के तहत अब बेअदबी से जुड़े मामलों में डिजिटल एंगल, सोशल मीडिया गतिविधियों और फंडिंग की भी विस्तृत जांच की जाएगी। इन मामलों की निगरानी सीधे तौर पर संबंधित जिले के एसएसपी या पुलिस कमिश्नर द्वारा की जाएगी। साथ ही जांच को 60 से 90 दिनों के भीतर पूरा कर चालान पेश करना अनिवार्य कर दिया गया है।

एसओपी में पुलिस के लिए छह अहम दिशा-निर्देश तय किए गए हैं। सबसे पहले, घटना की सूचना मिलते ही एसएचओ और जांच अधिकारी को बिना देरी किए मौके पर पहुंचना होगा। सबूतों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए घटनास्थल पर दो स्तर का घेरा बनाया जाएगा एक आंतरिक और एक बाहरी ताकि भीड़ को नियंत्रित किया जा सके और साक्ष्य सुरक्षित रह सकें।

धार्मिक संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए, श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के ‘अंगों’ (पन्नों) या अन्य धार्मिक प्रतीकों को केवल अधिकृत धार्मिक प्रतिनिधियों की मौजूदगी में ही पूरी मर्यादा के साथ छुआ या स्थानांतरित किया जाएगा। इसके अलावा हर घटनास्थल की हाई-रिजॉल्यूशन फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी और मैपिंग की जाएगी तथा फॉरेंसिक टीमों को तुरंत मौके पर बुलाया जाएगा।

पुलिस केवल मौके पर पकड़े गए आरोपी तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसके पीछे की साजिश और संभावित मास्टरमाइंड की भी गहराई से जांच करेगी।

सोशल मीडिया पर फैलाए गए भ्रामक संदेश, डीपफेक वीडियो और डिजिटल गतिविधियों की जांच के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल्स का उपयोग किया जाएगा। साथ ही बिटकॉइन या अन्य क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से होने वाली संदिग्ध फंडिंग की भी जांच की जाएगी।

इसके अतिरिक्त, यदि किसी आरोपी की मानसिक स्थिति संदिग्ध पाई जाती है, तो उसकी जांच के लिए फॉरेंसिक मनोवैज्ञानिकों का एक विशेष बोर्ड गठित किया जाएगा। यह कदम यह सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है कि जांच पूरी तरह निष्पक्ष और वैज्ञानिक आधार पर हो।

पंजाब सरकार द्वारा लागू किए गए बेअदबी कानून के तहत दोषी पाए जाने पर कम से कम 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। इसके साथ ही 5 लाख से 25 लाख रुपये तक का जुर्माना भी लगाया जा सकता है। यह मामले गैर-जमानती श्रेणी में रखे गए हैं।