जयपुर, 07 अक्टूबर । राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि गजट नोटिफिकेशन में प्रकाशित नियमों का विधिक बल होता है और ऐसे नियमों को विभाग अपने कार्यालय आदेशों और परिपत्र आदि के जरिए संशोधित नहीं कर सकता। इसके साथ ही अदालत ने राजस्थान वाटर सप्लायर नियम, 1967 के नियमों में संशोधन के लिए 12 फरवरी, 2025 को जारी परिपत्र को रद्द कर दिया है। जस्टिस शुभा मेहता की एकलपीठ ने यह आदेश पीएचईडी कॉन्ट्रेक्टर कल्याण समिति की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। अदालत ने कहा कि ऐसा संशोधन केवल गजट नोटिफिकेशन के जरिए ही किया जा सकता है। वर्तमान मामले में जिस प्रकार के संशोधन नियमों में किए गए हैं, उससे संपूर्ण प्लंबिंग, जल मीटर, रोड कट, कनेक्शन लगाना आदि की संपूर्ण प्रक्रिया ही परिवर्तित हो रही है। प्रक्रिया का सरलीकरण करने और सुविधाएं देने के नाम पर प्रशासनिक आदेशों से नियमों में मूलभूत परिवर्तन नहीं किया जा सकता। ऐसे में 12 फरवरी को जारी परिपत्र क्षेत्राधिकार के बाहर होने के कारण रद्द किया जाता है।
याचिका में अधिवक्ता बाबूलाल गुप्ता और अधिवक्ता अंकुल गुप्ता ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता समिति जल आपूर्ति, मीटर कनेक्शन और प्लंबिंग लाइसेंस आदि देने का काम करती है और वह वाटर सप्लायर नियम, 1967 से तहत काम कर रही है। याचिका में कहा गया कि राज्य सरकार ने 12 फरवरी, 2025 को एक परिपत्र जारी कर 1967 के नियमों में संशोधन कर दिया। वहीं संपूर्ण प्लंबिंग, जल मीटर, रोड कट और रेस्टोरेशन के लिए 8100 रुपए तय कर दिए और नियमों में परिवर्तन कर यह काम ठेकेदारों को लाइसेंसी प्लबरों के माध्यम से कराने का अधिकार दे दिया। इसे चुनौती देते हुए कहा गया कि सरकार ने ठेकेदार के रूप में बीच में एक व्यक्ति को जोड़ दिया, जो लाइसेंसी के लिए अतिरिक्त राशि वसूलेगा। जिससे सरकार को राजस्व का नुकसान होगा। इसके अलावा पूर्व में लाइसेंसी प्लबरों के कार्य का निरीक्षण करने वाले पीएचईडी के जेईएन को हटा दिया गया है। इससे याचिकाकर्ता समिति से जुड़े करीब पांच हजार प्लबरों का रोजगार छिन जाएगा। याचिका में कहा गया कि नियमों को परिपत्र के आधार पर संशोधित नहीं किया जा सकता। ऐसे में 12 फरवरी को जारी परिपत्र को रद्द किया जाए। जिसका विरोध करते हुए राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि वाटर सप्लाई एंड सीवरेज कॉरपोरेशन एक्ट, 1979 की धारा 68 के तहत विभाग सरकार की पूर्व अनुमति से नियमों को बनाने, संशोधित करने और रूपांतरित कर सकती है। ऐसे में नियमों में किया गया संशोधन वैध है। दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद अदालत ने नियमों में संशोधन के लिए जारी 12 फरवरी, 2025 के परिपत्र को रद्द कर दिया है।