जोधपुर, 30 अपै्रल । राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम के प्रबंध निदेशक को ट्रांसपोर्ट कमिश्नर के पद पर काम करने से रोक दिया है। कोर्ट ने कहा कि राज्य उपक्रम परिवहन सेवा प्रदान करने के व्यवसाय में निजी ऑपरेटरों के साथ प्रतिस्पर्धा करने वाला आरएसआरटीसी का अफसर निष्पक्ष निगरानी नहीं रख सकता है।
जस्टिस आनंद शर्मा की एकल पीठ ने 21 नवंबर 2025 के उस आदेश के क्रियान्वयन पर आगामी आदेशों तक रोक लगा दी है, जिसके जरिए आरएसआरटीसी के एमडी पुरुषोत्तम शर्मा को ट्रांसपोर्ट कमिश्नर के रूप में तैनात किया गया था। मामले को लेकर ऑल इंडिया टूरिस्ट परमिट बस ओनर्स एसोसिएशन ने अपने अधिकृत प्रतिनिधि राजेंद्र परिहार के माध्यम से यह याचिका दायर की थी। याचिका में 21 नवंबर 2025 के आदेश को चुनौती देते हुए ट्रांसपोर्ट कमिश्नर के पद पर काम करने के अधिकार और क्षमता पर सवाल उठाए गए थे, क्योंकि वह एक ही समय में आरएसआरटीसी के एमडी के पद पर भी कार्यरत हैं। मामले में अब अगली सुनवाई 18 मई को होगी।
याचिकाकर्ता के वकील डॉ. मोहित सिंघवी, विश्वास खत्री और उत्कर्ष बाफना ने मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 68(2) का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि ऐसा कोई भी व्यक्ति, जिसका किसी परिवहन उपक्रम में मालिक, कर्मचारी या अन्य रूप में कोई वित्तीय हित है, उसे राज्य या क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकरण का सदस्य नियुक्त नहीं किया जा सकता। वकीलों ने आरोप लगाया कि ट्रांसपोर्ट कमिश्नर के पद पर रहते हुए पुरुषोत्तम शर्मा राज्य भर के क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकरणों पर प्रशासनिक नियंत्रण और व्यापक निगरानी रखते हैं। वहीं सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता (एएजी ) बी.एल. भाटी के लिए सहायक अतिरिक्त महाधिवक्ता एएएजी दीपक चांडक व सुलोचना बिश्नोई और एएजी राजेश पंवार के लिए वकील आदित्य माहेचा ने याचिका का विरोध किया। सरकारी वकीलों ने तर्क दिया कि ट्रांसपोर्ट कमिश्नर परिवहन नीति पर निर्णय लेने वाला एकमात्र अधिकारी नहीं है, बल्कि वह बोर्ड का केवल एक हिस्सा है। हालांकि, वे इस तथ्य का खंडन नहीं कर सकें कि कमिश्नर का क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकरणों पर नियंत्रण होता है और वह राज्य परिवहन प्राधिकरण का सदस्य भी होता है।