350 साल पुरानी परंपरा ने दिए शुभ संकेत, मेवाड़ में सामान्य से अधिक बारिश और अच्छी पैदावार का अनुमान

राजसमंद, 30 जुलाई । मेवाड़ अंचल में मानसून और फसलों का पारंपरिक पूर्वानुमान लगाने की 350 वर्ष से अधिक पुरानी परंपरा एक बार फिर शुभ संकेत लेकर आई है। विश्व प्रसिद्ध श्रीनाथजी मंदिर के खर्च भंडार में संपन्न हुई आषाढ़ी तौल के अनुसार इस वर्ष क्षेत्र में सामान्य से अधिक वर्षा होने तथा अनाज की पैदावार बेहतर रहने का अनुमान लगाया गया है।

मंदिर में सदियों से चली आ रही इस अनूठी परंपरा को आज भी किसान और व्यापारी बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं तथा इसी के आधार पर आगामी कृषि और व्यापारिक योजनाएं तैयार करते हैं।

परंपरा के अनुसार आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा के दिन मंदिर के खर्च भंडार में 27 प्रकार की कृषि उपज एवं अन्य सामग्रियों को अलग-अलग पात्रों में तौलकर सुरक्षित रखा जाता है। इनमें मूंग, मक्का, बाजरा, ज्वार, तिल, उड़द, मोठ, ग्वार, गेहूं, चना, सरसों, गुड़, नमक, घास सहित विभिन्न अनाज और वस्तुएं शामिल होती हैं। अगले दिन सावन कृष्ण प्रतिपदा पर ग्वाल दर्शन के समय इन्हीं सामग्रियों को दोबारा तौला जाता है।

दोनों दिनों के वजन में आए अंतर के आधार पर आगामी वर्ष की वर्षा, फसल उत्पादन, व्यापार, पशुधन और अन्य प्राकृतिक परिस्थितियों का पारंपरिक पूर्वानुमान लगाया जाता है।

इस वर्ष श्रीनाथजी मंदिर के मुख्य पंड्या परेश नागर के सान्निध्य में खर्च भंडार के भंडारी प्रकाशचंद्र सनाढ्य तथा कर्मचारियों की उपस्थिति में पुनः तौल की गई। तौल के परिणामों के आधार पर इस वर्ष धान्य उत्पादन को श्रेष्ठ माना गया है तथा सामान्य से अधिक वर्षा होने के संकेत मिले हैं।

मुख्य पंड्या परेश नागर ने बताया कि पारंपरिक गणना के अनुसार आषाढ़ में तीन आना, सावन में पांच आना, भाद्रपद (भादवा) में पांच आना तथा आसोज में दो आना वर्षा होने के संकेत प्राप्त हुए हैं। साथ ही इस वर्ष हवा का रुख पूर्व दिशा की ओर रहने का भी अनुमान लगाया गया है।

आषाढ़ी तौल में वर्षा का अनुमान लगाने की भी विशेष परंपरा है। इसके लिए एक अलग पात्र में पानी भरकर उसके चारों ओर चार छोटे पिंड बनाए जाते हैं, जिन्हें आषाढ़, सावन, भाद्रपद और आसोज माह का प्रतीक माना जाता है। 24 घंटे बाद इन पिंडों में आई नमी के आधार पर संबंधित माह में वर्षा की मात्रा का अनुमान लगाया जाता है। जिस पिंड में अधिक नमी होती है, उस महीने में अधिक वर्षा होने का संकेत माना जाता है।

तौल के अनुसार इस वर्ष गुड़, नमक, मनुष्य और पशुओं में कमी के संकेत मिले हैं, जबकि अधिकांश अन्य जिंसों में बढ़ोतरी दर्ज की गई। वहीं हरा मूंग, उड़द, सरसों और घास के वजन में कोई विशेष परिवर्तन नहीं होने से इन्हें सामान्य माना गया है। परंपरागत मान्यता के अनुसार गुड़ में वृद्धि लोगों के बीच प्रेम और सौहार्द बढ़ने का प्रतीक होती है, जबकि नमक में वृद्धि को मतभेद या ईर्ष्या बढ़ने का संकेत माना जाता है।

मेवाड़ क्षेत्र के ग्रामीण किसान इस पारंपरिक पूर्वानुमान के आधार पर खरीफ फसलों की बुवाई, सिंचाई और कृषि प्रबंधन की योजना बनाते हैं।

वहीं अनाज व्यापारी भी इसी अनुमान को ध्यान में रखते हुए अपने व्यापार और भंडारण की रणनीति तय करते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि वर्षों से चली आ रही यह परंपरा अनेक बार वास्तविक मौसम के काफी करीब साबित हुई है, इसलिए आज भी इसका विशेष महत्व बना हुआ है।

आषाढ़ी तौल के दौरान खर्च भंडारी प्रकाशचंद्र सनाढ्य, मुख्य पंड्या परेश नागर, सहायक अधिकारी अनिल सनाढ्य, लोकेश लोधा, ओमप्रकाश सनाढ्य, घनश्याम पालीवाल एवं कैलाश पालीवाल सहित मंदिर के अन्य अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित रहे।