मेले का मुख्य आकर्षण वह क्षण रहा जब ढोल-दमाऊ, भोंपू की थाप और “जय जाख देवता“ के गगनभेदी उद्घोष के बीच नर देवता ने दहकते अग्निकुंड में प्रवेश किया। इस बार भगवान जाख ने एक नहीं बल्कि तीन बार अग्निकुंड के भीतर जाकर नृत्य किया और भक्तों पर कृपा बरसाई। रोंगटे खड़े कर देने वाले इस दृश्य को देखकर न केवल श्रद्धालु, बल्कि आधुनिक विज्ञान के जानकार भी अचंभित रह गए। नगर भ्रमण और स्नान परंपरा के अनुसार नर देवता को उनके मूल गांव से देवशाल स्थित विंध्यवासिनी मंदिर लाया जाता है। यहाँ से जाख की कंडी और जलते दीपक के साथ मंदिर प्रस्थान होता है। मंदिर परिसर में बांज के वृक्ष के नीचे ढोल सागर की विशेष थाप पर देवता अवतरित होते हैं, जिसके बाद उन्हें तांबे की गागर के पवित्र जल से स्नान कराया जाता है।
नारायणकोटी, देवशाल और कोठड़ा गांवों के ग्रामीण मिलकर विशाल अग्निकुंड तैयार करते हैं। वैशाख संक्रांति की रात को जागरण के साथ अग्नि प्रज्वलित की जाती है और अगले दिन (द्वितीया) सुबह बड़ी लकड़ियां हटाकर केवल लाल अंगारों के बीच यह दिव्य नृत्य संपन्न होता है।
संस्कृति की जीवंत झलक’
रुद्रप्रयाग। गुप्तकाशी से लगभग 6 किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर में भगवान जाख को यक्ष के रूप में पूजा जाता है। मेले में पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं ने न केवल भगवान के दर्शन कर पुण्य लाभ अर्जित किया, बल्कि मेले के सांस्कृतिक परिवेश और स्थानीय बाजार का भी आनंद लिया। यह मेला उत्तराखंड की उस समृद्ध लोक संस्कृति का प्रतीक है, जहां आज भी श्रद्धा और विश्वास के आगे विज्ञान मौन खड़ा नजर आता है। जाख मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की एकता और जीवंत परंपराओं का प्रतिबिंब है।