प्रयागराज, 17 अक्टूबर । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग के कक्षा 1 से 8 तक के सभी शिक्षकों को अपने नियुक्ति पत्र और शैक्षणिक दस्तावेज़ जमा करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने कुसुमलता की याचिका पर यह आदेश पारित किया।
स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ), लखनऊ के अपर पुलिस अधीक्षक कार्यालय से मिले निर्देशों के आधार पर बताया गया कि याची कुसुमलता ने गोरखपुर के कोदीपुर स्थित कंपोजिट प्राथमिक विद्यालय बैरीपार में तैनात सहायक अध्यापिका कुसुमलता श्रीवास्तव के शैक्षणिक दस्तावेज़ों का इस्तेमाल कर नौकरी हासिल की। याचिकाकर्ता 12 और 13 अक्टूबर को एसटीएफ के समक्ष पेश नहीं हुईं और सत्यापन के लिए अपनी शैक्षणिक योग्यता के कागज़ात भी जमा नहीं किए।
पिछली सुनवाई पर उनके अधिवक्ता ने कहा था कि हाल ही में ऑपरेशन होने के कारण वह बेड रेस्ट पर है।
कोर्ट ने कहा कि एसटीएफ की जांच में सामने आया है कि प्रदेश में बड़ी संख्या में शिक्षकों ने जाली दस्तावेज़ों या किसी अन्य के दस्तावेज़ों के सहारे नौकरी पाई है। कई मामलों में एक ही शैक्षणिक दस्तावेज़ पर दस या उससे अधिक लोग नौकरी कर रहे हैं।
न्यायालय ने समन्वय पीठ के 22 जनवरी 2026 के आदेश गरिमा सिंह बनाम राज्य, का भी उल्लेख किया, जिसमें प्रमुख सचिव को फर्जी नियुक्ति वाले शिक्षकों के विरुद्ध नियुक्ति निरस्त करने और वेतन वसूली सहित कार्रवाई करने तथा मिलीभगत करने वाले अधिकारियों पर कठोर विभागीय और दंडात्मक कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए थे। इसके लिए छह माह की समय-सीमा तय की गई थी।
न्यायालय ने कहा कि बड़ी संख्या में प्राथमिक विद्यालय छात्र संख्या घटने से बंद हुए हैं, जिसका कारण संसाधनों की कमी नहीं बल्कि शिक्षा की गिरती गुणवत्ता और शिक्षकों का अपर्याप्त प्रदर्शन है। कोर्ट के अनुसार यह समस्या हाल की नियुक्तियों तक सीमित नहीं, बल्कि पिछले दो दशकों से फर्जी तरीकों से हो रही नियुक्तियों की देन है।
मुफ्त किताबें, मिड-डे मील और यूनिफॉर्म जैसी सुविधाओं के बावजूद सुधार न होने पर कोर्ट ने कहा कि इसका एक प्रमुख कारण शिक्षकों की गुणवत्ता हो सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अच्छे शिक्षक के लिए केवल विषय का ज्ञान काफी नहीं, बल्कि शिक्षण क्षमता, नियमित उपस्थिति, बच्चों के प्रति धैर्य और निष्पक्षता भी आवश्यक है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जो व्यक्ति नियुक्ति करने वाले प्राधिकारी को धोखा देकर शुरुआत करता है, उससे बच्चों के भरोसे को निभाने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
न्यायालय ने कहा सभी शिक्षक एक हफ्ते में बी एस ए को सारे दस्तावेज देंगे। सभी शिक्षक नोटरी से प्रमाणित शपथ पत्र देकर बताएंगे कि उनके कोई निकट संबंधी बीएसए या उससे ऊपर के पद पर शिक्षा विभाग में कार्यरत या सेवानिवृत्त हैं या नहीं। निकट संबंधियों में पति/पत्नी, पिता, पुत्र, पुत्री, दामाद, बहू, सास, ससुर, साला/जीजा और चचेरे भाई-बहन आदि शामिल हैं। ऐसा कोई संबंधी न होने पर भी इस आशय का वचनपत्र देना होगा।
प्रदेश के सभी बीएसए तत्काल प्रधानाध्यापकों और प्रभारी प्रधानाध्यापकों को आदेश जारी करेंगे। दस्तावेज़ मिलते ही शिक्षकों का नाम, नियुक्ति तिथि, शैक्षणिक योग्यता, तत्समय अपेक्षित न्यूनतम योग्यता और गजट के अनुसार प्राप्त मेरिट आदि की एक एक्सेल शीट तैयार कर दस्तावेज़ों समेत एसटीएफ की संबंधित रेंज को भेजी जाएगी।
प्रदेश में एसटीएफ के रेंज प्रमुख सत्यापन की व्यवस्था बनाएंगे और जरूरत पर पुलिस अधीक्षक, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक या पुलिस आयुक्त की मदद ले सकेंगे।
शिक्षा निदेशक बीएसए द्वारा की जा रही कार्यवाही की निगरानी करेंगे, जबकि अपर पुलिस महानिदेशक, एसटीएफ सत्यापन और जांच की निगरानी करेंगे। दोनों अपनी ओर से दैनिक पर्यवेक्षण के लिए अधिकारी नामित कर सकते हैं।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि किसी भी अधिकारी की लापरवाही गंभीरता से ली जाएगी और उसे व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया जा सकता है।
उच्च न्यायालय ने मामले को 4 नवंबर 2026 को अनुपालन रिपोर्ट और आगे के विचार के लिए सूचीबद्ध किया है। कहा कि किसी अधिकारी को प्रशासनिक कठिनाई या संसाधनों की कमी हो तो वह उचित आवेदन दे सकता है या अगली सुनवाई से पहले भी मामला कोर्ट के संज्ञान में ला सकता है।