प्रयागराज, 07 नवंबर । परमाणु विज्ञान आज केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि चिकित्सा, कृषि, खाद्य संरक्षण, औद्योगिक विकास और अंतरिक्ष अनुसंधान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। विकिरण तकनीक की मदद से कैंसर का उपचार करने के साथ खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखने और भारतीय आम को समुद्री मार्ग से अमेरिका तक निर्यात करना संभव हुआ है।
यह जानकारी शनिवार को परमाणु ऊर्जा विभाग के पूर्व विशिष्ट वैज्ञानिक एवं नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, इंडिया (नासी) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. राजेश एच. वत्स ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आयोजित विशेष व्याख्यान में दी। वे विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान विभाग और यूजीसी-मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र की ओर से आयोजित 12 दिवसीय ऑनलाइन पुनश्चर्या पाठ्यक्रम ‘जीवन और सतत सशक्तीकरण के लिए रसायन विज्ञान’ के पांचवें दिन नोबेल पुरस्कार विजेता मैडम मैरी क्यूरी की 159वीं जयंती के उपलक्ष्य में विशेष व्याख्यान दे रहे थे।
उन्होंने रेडियोधर्मिता की खोज के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वर्ष 1895 में विल्हेम रॉन्टजन ने एक्स-रे की खोज की और 1896 में हेनरी बेकरल ने प्राकृतिक रेडियोधर्मिता का पता लगाया। इसके बाद मैरी क्यूरी और पियरे क्यूरी के शोध से वर्ष 1898 में पोलोनियम और रेडियम तत्वों की खोज हुई। मैरी क्यूरी के वैज्ञानिक समर्पण और शोध ने परमाणु विज्ञान के आधुनिक उपयोगों की नींव रखी।
विकिरण तकनीक से अमेरिका पहुंच रहे भारतीय आमडॉ. वत्स ने बताया कि भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बार्क) ने विकिरण आधारित कीट नियंत्रण की स्वदेशी तकनीक विकसित की है। इससे भारतीय आम का समुद्री मार्ग से अमेरिका निर्यात करने में सुविधा मिली है। इस तकनीक में फलों को नियंत्रित मात्रा में आयनकारी विकिरण दिया जाता है, जिससे उनमें मौजूद हानिकारक कीटों की वृद्धि और प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है। इससे अंतरराष्ट्रीय कृषि एवं पादप स्वास्थ्य मानकों का पालन करने में मदद मिलती है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि निर्धारित मानकों के अनुसार विकिरण से उपचारित खाद्य पदार्थ रेडियोधर्मी नहीं बनते। यह प्रक्रिया खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखने के लिए नियंत्रित विकिरण के उपयोग पर आधारित है। आलू, प्याज और लहसुन में अंकुरण रोकने तथा मसालों में सूक्ष्म जीवों का संक्रमण कम करने में भी इस तकनीक का उपयोग किया जाता है।कैंसर के उपचार में भी उपयोगी है परमाणु तकनीकडॉ. वत्स ने चिकित्सा क्षेत्र में परमाणु विज्ञान के योगदान की जानकारी देते हुए बताया कि विकिरण चिकित्सा से कैंसर कोशिकाओं के डीएनए को नुकसान पहुंचाकर उनकी वृद्धि रोकी जाती है। भारत में विकसित कोबाल्ट-60 आधारित भाभाट्रॉन मशीन कैंसर के उपचार में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। इसके अलावा ब्रेकीथेरेपी में रेडियोधर्मी स्रोत को ट्यूमर के भीतर या उसके पास रखकर उपचार किया जाता है।
उन्होंने बताया कि रेडियोधर्मी आयोडीन-131 का उपयोग थायरॉइड संबंधी कुछ बीमारियों और कैंसर के उपचार में किया जाता है। वहीं पीईटी और स्पेक्ट जैसी आधुनिक जांच तकनीकों से शरीर के अंगों की कार्यप्रणाली और रोगों की पहचान में सहायता मिलती है।कृषि और उद्योग में भी बढ़ रहा उपयोगव्याख्यान में उन्होंने बताया कि नियंत्रित विकिरण के माध्यम से पौधों में आनुवंशिक बदलाव उत्पन्न किए जा सकते हैं। उपयोगी गुणों वाले पौधों का चयन कर अधिक उत्पादन, जल्दी पकने, रोग प्रतिरोधक क्षमता और प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने वाली फसलें विकसित करने में मदद मिलती है। रेडियो समस्थानिकों के माध्यम से मिट्टी में पोषक तत्वों के उपयोग और उर्वरकों की दक्षता का भी अध्ययन किया जाता है।
औद्योगिक क्षेत्र में धातुओं और वेल्डिंग की आंतरिक खामियों का पता लगाने के लिए विकिरण आधारित जांच तकनीक का उपयोग किया जाता है। चिकित्सा उपकरणों को संक्रमणमुक्त करने और अंतरिक्ष अभियानों में ऊर्जा उपलब्ध कराने के लिए भी परमाणु तकनीक उपयोगी साबित हो रही है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय की जनसंपर्क अधिकारी प्रो. जया कपूर ने बताया कि पुनश्चर्या पाठ्यक्रम के समन्वयक प्रो. विष्णु पी. श्रीवास्तव ने डॉ. वत्स के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि मैरी क्यूरी की जयंती पर आयोजित यह व्याख्यान इस बात का उदाहरण है कि एक सदी से भी पहले हुई वैज्ञानिक खोजें आज भी मानव कल्याण में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। इस पुनश्चर्या पाठ्यक्रम में देश के 19 राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों के 265 शिक्षक प्रतिभागी शामिल हो रहे हैं।